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योग, विज्ञान, आध्यात्मिकता और चिककमसक

Writer: support docterz
support docterz
Apr 16
2 min read

आदरणीय दया राव महोदय, ववद्वान शिक्षकों, मंचासीन अतिथियों और उपस्थिि सभी महानुभावों

को मेरा सादर नमथकार एवं हार्दिक अशभनंदन।

मैं आप सभी का थवागि करिा ह ूँ इस आध्यास्ममक यात्रा में, स्िसका उद्देश्य है कक हम थचककमसा के

क्षेत्र में के वल िारीररक नहीं, बस्कक मानशसक, सामास्िक और आध्यास्ममक उमिान की ओर अग्रसर

हों।

नैततकता, आध्यात्मिकता और चिककमसक का दातयमि

थचककमसा एक ऐसा पेिा है, िो उिना ही प्राचीन है स्ििनी मानव सभ्यिा थवयं। कहा िािा है, िब

आदम और हव्वा ने तनविद्ध फल का थवाद चखा, िभी से मानव ने पीडा और रोग का अनुभव करना

आरंभ ककया। उस समय भी ककसी ने ककसी रूप में उपचार का बीडा उठाया होगा। नाम भले ही शभन्न

रहे हों, उद्देश्य एक ही रहा—दुख से ग्रथि मानविा की सेवा।

आधुतनक थचककमसा शिक्षा िीन म ल थिंभों पर र्िकी है—

1. ज्ञान (संज्ञानामिक क्षेत्र)

2. कौशल (िनोदैहिक क्षेत्र)

3. नैततकता (भािनामिक क्षेत्र)

ककन्िु एक महमवप णि थिंभ, आध्यात्मिकता, अब भी हमारी थचककमसा-शिक्षा प्रणाली से अनुपस्थिि

है। मेरे गुरुदेव, बीसवीं सदी के महान योगी परि पूज्य स्िािी राि जी, अक्सर कहा करिे िे —

िब िक शिक्षा में आध्यास्ममकिा नहीं िोडी िािी , िब िक हम केवल बाहरी ववकास कर सकिे हैं,

आंिररक नहीं।

हमारे प्राचीन गुरुक ु लों में यही दििन कें द्र में िा। शिक्षा का प्रारंभ होिा िा एक र्दव्य प्राििना से:

ॐ सि नािितु।

सि नौ भुनक्तु।

सि िीयं करिाििै।

तेजत्स्िनािधीतिस्तु िा विद्विषाििै।

इस प्राििना में सहयोग, सह-अध्ययन, सह-उमिान और ईर्षयािववहीन ज्ञान यात्रा का संककप तिपा है।

आि, िब नैतिकिा और म कयों का ह्रास हो रहा है, हमें पुनः उन म कयों की ओर लौिने की आवश्यकिा

है।चिककमसा: व्यिसाय या सेिा?

आि की थचककमसा अमयथधक िकनीकी और व्यवसातयक हो गई है। हम मरीि को “मिीन” समझने

लगे हैं—िैसे एक कार मैके तनक, िो के वल दोि पहचानिा है और बदल देिा है।

क्या िि भूलते जा रिे िैं कक रोगी के िल शरीर निीं, िन और आमिा भी िै?

िकनीक का उपयोग आवश्यक है, परंिु िब वह करुणा, संवेदना और मानविा को ढकने लगे, िो वह

घािक बन िािी है।

कट प्रैत्क्टस”, अनािश्यक जााँिें, और व्यािसातयक लालसा थचककमसा को कलंककि कर रही हैं। डाउ

के शमकल की “Micromastia” की कहानी हमें शसखािी है कक िब बीमारी गढी िािी है लाभ के शलए, िो

ववज्ञान और नैतिकिा दोनों पर आघाि होिा है।

हमें यह थमरण रखना चार्हए:

एक चिककमसक की आय, उस व्यत्क्त की पीडा पर आधाररत िोती िै, जो उसके पास सिायता के ललए

आया िै।

इसशलए थचककमसक की कमाई वववेकप णि, संिुशलि और संवेदनिील होनी चार्हए।

िरक संहिता िें स्पष्ट ललखा िै:

“न थवािािय , न लोभाय , केवलं मानवसेवािं थचककमसया मे ववद्या।”

चिककमसा और आध्यात्मिकता का संगि

मेरे आध्यास्ममक गुरु थवामी राम िी कहा करिे िे:

“ववज्ञान िरीर की सेवा करिा है, प रं ि ु आध्यास्ममकिा आममा की। केवल ववज्ञान आममहीन है।”

िब हम मरीि की सेवा करिे हैं, प्रेमप विक, तनःथवािि भाव से, िो वही कायि कमियोग बन िािा है।

मैंने एक बार कहा –

मैं डॉक्िर ह ूँ

, ध्यान-साधना का समय नहीं है।

गुरुदेव ने उत्तर र्दया –

“अपने कायि को ही ध्यान बना लो। िब ि ु

म सेवा को साधना समझोगे, िब हर मरीि में ि ु

म् हें ईश्वर की झलक

शमलेगी।”िब हम ऑपरेिन थिएिर में होिे हैं, सब क ु ि भ लकर के वल रोगी के ककयाण की भावना में लीन रहिे

हैं—यही िो सच्ची आध्यास्ममकिा है।

मेरे गुरुिी कहा करिे िे—

“यर्द मैं द स र ों में बसे ईश्वर की सेवा नहीं कर सकिा , िो मंर्दर , मस्थिद या चचि िाना व्यिि है।”

सिापन: चिककमसक = साधक

थचककमसक एकमात्र ऐसा साधक है, स्िसे चौबीसों घंिे मानविा की सेवा का अवसर प्राप्ि है।

यह एक िपथया है। यह ध्यान है। यह कमियोग है।

आइए, इस पववत्र पेिे को पुनः उसकी गररमा र्दलाएं। सेवा, करुणा, प्रेम और आध्यास्ममक दृस्र्षि से इसे

सुसस्जिि करें।

और अन्त िें, आप सभी से िेरा यिी अनुरोध िै

यर्द िीवन को सफल, थनेहप णि और मोक्षमुक्ि बनाना है, िो योग को अपनाइए, आममिुद्थध कीस्िए,

और आध्यास्ममक पि पर दृढ तनर्षठा के साि आगे बर्ढए।

धन्यिाद।

 
 
 

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